FDI वृद्धि 5 वर्षों के न्यूनतम स्तर पर

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देश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) वृद्धि दर पिछले 5 वर्षों के न्यूनतम स्तर पर आ गई है। औद्योगिक नीति और संवर्द्धन विभाग (DIPP) द्वारा जारी नवीनतम आँकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2017-18 मार्च के दौरान देश में FDI की आवक महज़ 3 प्रतिशत वृद्धि दर के साथ 44.85 बिलियन डॉलर रही। जबकि वित्तीय वर्ष 2016-17 में यह 8.67 प्रतिशत, 2015-16 में 29 प्रतिशत, 2014-15 में 27 प्रतिशत तथा 2013-14 में 8 प्रतिशत थी। हालाँकि, वर्ष 2012-13 में FDI प्रवाह में 38% की नकारात्मक वृद्धि दर्ज की गई थी।

आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, FDI आवक की स्थिति में सुधार करने के लिये ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस संबंधी नियमों में काफी सुधार किया जाने की ज़रूरत है। इसके साथ ही सरकार को घरेलू निवेश में वृद्धि करने संबंधी उपायों की दिशा में भी प्रभावी कदम उठाने की आवश्यकता है, ताकि देश में FDI के प्रवाह में वृद्धि की जा सके।

वस्तुतः उपभोक्ता और खुदरा क्षेत्र में FDI की कम वृद्धि दर का मुख्य कारण इन क्षेत्रों में FDI नीतियों में निहित अनिश्चितता और जटिलता रही है। हालाँकि इस संदर्भ में सरकार की ओर से काफी प्रयास किये जा रहे हैं (बहुत से नियमों को सरल बनाया गया है तथा पहले से मौजूद व्यवस्थाओं में निहित अस्पष्टताओं में भी सुधार किया गया है), लेकिन अभी भी अंतर्राष्ट्रीय उपभोक्ता और रिटेल कंपनियाँ भारत में निवेश करने से घबरा रही हैं। व्यापार नियमों में सुधार का प्रभाव देश की ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस रैंकिंग में नज़र आता है, इसके बावजूद विदेशी निवेशकों को भारत में निवेश के लिये आकर्षित करने हेतु और प्रयास किये जाने की आवश्यकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी देश के FDI के आकार में उस देश की अर्थव्यवस्था की वास्तविक तस्वीर नज़र आती है। पिछले कुछ वर्षों में देश में घरेलू निवेश के स्तर पर उदासीनता की स्थिति देखने को मिली है, जिसका प्रभाव अब FDI के प्रवाह पर भी दिखाई देने लगा है।