21 मार्च: विश्व वन दिवस

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21 मार्च, 2018 को संपूर्ण विश्व में विश्व वन दिवस मनाया गया। इस दिवस के मनाने का उद्देश्य वन संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा वर्तमान और भावी पीढ़ी के विकास को सुदृढ़ बनाना है। वर्ष 2018 के लिए विश्व वन दिवस की थीम “फॉरेस्ट्स फॉर सस्टेनेबल सिटीज” है।

भारत में वन आवरण:

‘भारत वन स्‍थिति रिपोर्ट 2017’ के अनुसार, वन क्षेत्र के मामले में भारत दुनिया के शीर्ष 10 देशों में है।

  • भारत के भू-भाग का 24.4 प्रतिशत हिस्‍सा वनों और पेड़ों से घिरा है, हालांकि यह विश्‍व के कुल भूभाग का केवल 2.4 प्रतिशत हिस्‍सा है और इन पर 17 प्रतिशत मनुष्‍यों की आबादी और मवेशियों की 18 प्रतिशत संख्‍या की जरूरतों को पूरा करने का दवाब है।
  • एफएओ की रिपोर्ट के अनुसार भारत को दुनिया के उन 10 देशों में 8 वां स्‍थान दिया गया है जहां वार्षिक स्‍तर पर वन क्षेत्रों में सबसे ज्‍यादा वृद्धि दर्ज हुई है।
  • देश में वन और वृक्षावरण की स्‍थिति में 2015 की तुलना में 8021 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि हुई है।

भारत सरकार द्वारा वर्ष 1952 में निर्धारित राष्ट्रीय वन नीति के तहत देश के 33.3 % क्षेत्र पर वन होने चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं है। धीरे-धीरे हमारे वन नष्ट होते जा रहें है। वन-भूमि पर उद्योग-धंधो तथा मकानों का निर्माण, वनों को खेती के काम में लाना और लकड़ियों की बढती माँग के कारण वनों की अवैध कटाई आदि वनों के नष्ट होने के प्रमुख कारण है। इन वनों के सुधार तथा विकास हेतु निम्न कदम उठाए जा सकते हैं:

  • नैसर्गिक रूप से हमारे देश में कई स्थानों पर बेकार पड़ी भूमि (खेती के अयोग्य) पर वृक्षों को रोपित किया जा सकता है।
  • तालाबों, नहरों, सड़कों, रेलमार्गों के किनारों पर वृक्षारोपण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
  • इसके अलावा वन अनुसंधान संस्थान वन विभाग, वन निगम, भारतीय वन सर्वेक्षण, रिमोट, सेंसिंग सेंटर इत्यादि संस्थानों को समय-समय पर वनों की जाँच-पड़ताल, अनुसंधान तथा विकास हेतु सतत कार्य किया जाना चाहिए। 
  • स्थानीय स्वैच्छिक संस्थानों को ग्राम स्तर पर वनों के प्रति शिक्षा व पर्यावरण में उसके महत्त्व तथा वनों के सुधार व विकास हेतु प्रयोगात्मक रूप में कार्य करना चाहिए ताकि वनों के प्रति लोगों का नया दृष्टिकोण सामने आ सके। 

इतिहास:

विश्व वन दिवस पहली बार वर्ष 1971 में यूरोपीय कृषि परिसंघ की 23वीं महासभा द्वारा मनाया गया था। भारत में इस दिवस की शुरूआत 1950 में हुई थी। इस दिवस की शुरूआत भारत के तत्कालीन गृहमंत्री कुलपति कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने की थी। इसके सम्बन्ध में पर्यावरणविद डॉ. कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने कहा था- “वृक्षों का अर्थ है जल, जल का अर्थ है रोटी और रोटी ही जीवन है।”