सिन्धु जल संधि वार्ता में भारत-पाक के बीच कोई समझौता नहीं

0
53

भारत और पाकिस्तांन के बीच सिन्धु0 जल संधि वार्ता के अद्यतन दौर की बातचीत बिना किसी निष्कार्ष के समाप्त हो गयी। विश्वऔ बैंक मुख्याालय में 14-15 सितम्बनर को हुई दो दिन की वार्ता में कोई समझौता नहीं हो पाया।

विश्व बैंक इस समझौते का तीसरा पक्ष है और वह दोनों देशों के बीच पैदा हुए मतभेदों को दूर कराने का प्रयास कर रहा है। विश्व बैंक ने कहा है कि समझौते को लेकर दोनों देशों के मतभेद दूर कराने के लिए निष्पक्ष रूप से वह अपने प्रयास जारी रखेगा। भारत में बन रहीं रतले और किशनगंगा पनबिजली परियोजनाओं पर पाकिस्तान की आपत्ति के बाद विश्व बैंक ने दोनों देशों के अधिकारियों की बैठक आयोजित की थी। एक अगस्त को हुई पहले दौर की बातचीत के बाद दूसरा दौर 14 सितंबर को शुरू हुआ। दो दिन चली वार्ता के बाद बिना किसी नतीजे के बैठक खत्म हो गई। भारतीय शिष्‍टमंडल का नेतृत्‍व केन्‍द्रीय जल संसाधन सचिव अमरजीत सिंह ने किया। इसमें विदेशी मंत्रालय, विद्युत मंत्रालय, सिंधु जल आयोग और केन्‍द्रीय जल आयोग के प्रतिनिधियों ने भी हिस्‍सा लिया। पाकिस्‍तान के शिष्‍टमंडल का नेतृत्‍व वहां के जल संसाधन डिविजन के सचिव आरिफ अहमद खान ने किया। 

विश्व बैंक के बयान में कहा गया है कि दोनों देश स्वीकार्य मसौदे तक नहीं पहुंचे लेकिन वे समझौते के प्रावधानों के अनुरूप मतभेद सुलझाने को राजी हैं। बैठकों में दोनों देशों के सचिव स्तर के अधिकारियों ने हिस्सा लिया। नौ साल तक चले विचार-विमर्श के बाद सिंधु जल समझौते पर 1960 में दस्तखत हुए थे। विश्व बैंक की मदद से भारत और पाकिस्तान के बीच यह समझौता हुआ था। विश्व बैंक के भी इस पर दस्तख़त हैं।

सिंधु जल समझौता:

सिंधु जल संधि पानी के वितरण लिए भारत और पाकिस्‍तान के बीच हुई एक संधि है। इस संधि में विश्‍व बैंक (तत्कालीन पुनर्निर्माण और विकास हेतु अंतरराष्ट्रीय बैंक) ने मध्यस्थता की। इस संधि पर कराची में 19 सितंबर, 1960 को भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू  और पाकिस्‍तान के राष्‍ट्रपति अयूब खान ने हस्ताक्षर किये थे।

इस समझौते के अनुसार, तीन “पूर्वी” नदियों — ब्यासरावी और सतलुज — का नियंत्रण भारत को, तथा तीन “पश्चिमी” नदियों — सिंधुचिनाब और झेलम — का नियंत्रण पाकिस्तान को दिया गया। संधि के अनुसार भारत को उनका उपयोग सिंचाई, परिवहन और बिजली उत्पादन हेतु करने की अनुमति है। इस दौरान इन नदियों पर भारत द्वारा परियोजनाओं के निर्माण के लिए सटीक नियम निश्चित किए गए। यह संधि पाकिस्तान के डर का परिणाम थी कि नदियों का आधार (बेसिन) भारत में होने के कारण कहीं युद्ध आदि की स्थिति में उसे सूखे और अकाल आदि का सामना न करना पड़े।

1960 में हुए संधि के अनुसमर्थन के बाद से भारत और पाकिस्तान में कभी भी “जलयुद्ध” नहीं हुआ। हर प्रकार के असहमति और विवादों का निपटारा संधि के ढांचे के भीतर प्रदत्त कानूनी प्रक्रियाओं के माध्यम से किया गया है। इस संधि के प्रावधानों के अनुसार सिंधु नदी के कुल पानी का केवल 20% का उपयोग भारत द्वारा किया जा सकता है।