सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सभा चुनाव में नोटा विकल्प के उपयोग को रद्द किया

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सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सभा के चुनाव में नोटा (None of the above – उपरोक्त में से कोई नहीं) विकल्प के उपयोग को रद्द कर दिया है। इस दौरान तीन न्यायाधीशों के बेंच ने नोटा को अप्रत्यक्ष चुनावों में निष्पक्षता के विरुद्ध बताया और कहा कि इससे लोकतान्त्रिक मूल्यों का ह्रास होता है तथा इससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है।

इस निर्णय तीन न्यायाधीशों की बेंच द्वारा सुनाया गया, इसमें मुख्य न्यायधीश दीपक मिश्र के अलावा जस्टिस ए.एम. खानविल्कर और डी. वाई. चन्द्रचूड शामिल थे। यह फैसला शैलेश परमार की याचिका पर सुनाया गया था, उन्होंने चुनाव आयोग द्वारा राज्य सभा चुनाव में नोटा के इस्तेमाल के मंज़ूरी दिए जाने के फैसले को चुनौती दी थी।

चुनाव आयोग ने जून, 2014 में राज्य सभा चुनावों में नोटा के इस्तेमाल के लिए अधिसूचना जारी की थी, सर्वोच्च न्यायालय ने उस अधिसूचना को ख़ारिज कर दिया है। सर्वोच्च न्यायालय में अपने निर्णय में कहा कि नोटा से लोकतान्त्रिक मूल्यों का ह्रास होगा और इससे दल-बदल को बढ़ावा मिलेगा, जिससे भ्रष्टाचार के लिए द्वार खुल जायेंगे।

सर्वोच्च न्यायलय ने कहा कि अप्रत्यक्ष चुनावों में नोटा से निर्वाचक की भूमिका की अनदेखी होती है और इससे लोकतान्त्रिक मूल्य नष्ट होते हैं। अप्रत्यक्ष चुनावों में नोटा का उपयोग निष्पक्षता के विरुद्ध है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राज्य सभा में नोटा के उपयोग का वोटिंग प्रक्रिया पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

लोक सभा चुनाव (प्रत्यक्ष चुनाव) में नोटा के उपयोग को चुनाव आयोग ने 2013 में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद मंज़ूरी दी थी। जनवरी, 2014 में एक अधिसूचना के बाद नोटा को राज्य सभा चुनावों में भी शामिल किया गया। इसके बाद 2014 में 21 राज्यों में 76 राज्यसभा सीट, 2015 में तीन राज्यों में 8 राज्यसभा सीट, 2016 में 21 राज्यों में 70 राज्यसभा सीट, 2017 में तीन राज्यों में 10 राज्यसभा सीट तथा 2018 में 16 राज्यों में 58 राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव हुए। 2014 से सभी राज्य सभा चुनावों में नोटा का उपयोग किया जाने लगा। चुनाव आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय में राज्य सभा चुनावों में नोट के इस्तेमाल को उचित ठहराया था।