मानसिक रोगी को नहीं दी जा सकती फांसीः सर्वोच्च न्यायालय

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18 अप्रैल 2019 को सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि मानसिक रोगी को फांसी की सजा नहीं दी जा सकती है। उच्चतम न्यायालय के इस एैतिहासिक फैसले से मौत की सजा सुनाए गए उन कैदियों के लिए नई उम्मीद पैदा हो गई है। जो दोषसिद्धि के बाद मानसिक बीमारियों से ग्रसित हो गये है।

उच्चतम न्यायालय द्वारा यह फैसला न्यायमूर्ति एनवी रमन की अध्यक्षता वाली न्यायमूर्ति एम एम शांतानागौदार और इंदिरा बनर्जी की तीन जजों वाली बेंच ने सुनाया है।

न्यायमूर्ति एनवी रमन की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा है कि मृत्युदंड पाये व्यक्ति के स्वास्थ्य स्थिति अब अपीलीय अदालत के लिए उसे फांसी की सजा घटाने का कारक होगा।

तीन जजों की पीठ ने कहा कि अभियुक्त अब आपराधिक अभियोजन से बचने हेतु भारतीय दंड सहिंता के तहत ‘विधिसम्मत पागलपन’ की याचिका दायर कर सकता है तथा साथ ही बचाव पक्ष अपराध के वक्त से इसे जोड़ सकते हैं।

न्यायालय ने दोषी ठहराये गये कैदियों के लिए एक बड़ी राहत दे दी है क्योंकि वह अपनी मानसिक स्थिति की वजह से वह वारदात के अंजाम को जान नहीं सका।

पीठ ने कहा कि निर्देशों का दुरूपयोग को रोकने हेतु आरोपी पर यह भार होगा कि वह स्पष्ट सबूतों के साथ यह साबित करे कि वह गंभीर रूप से मानसिक बीमारी से पीड़ित है।

न्यायालय ने इस मामले में कहा कि उपयुक्त मामलों में अदालत दोषियों की मानसिक बीमारी के दावे पर विशेषज्ञ रिपोर्ट के लिए एक पैनल का गठन कर सकती है।