त्रिपुरा उच्च न्यायालय द्वारा पशु बलि पर प्रतिबंध का निर्णय

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27 सितंबर, 2019 को त्रिपुरा उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने राज्य के मंदिरों में जानवरों और पक्षियों की बलि देने की परंपरा पर प्रतिबंध लगा दिया। साथ ही न्यायालय ने सरकार को संवैधानिक मूल्यों और सभी जानवरों एवं पक्षियों के प्रति करुणा, प्रेम, मानवता के महत्त्व के बारे में लोगों को जागरूक करने का निर्देश दिया।

त्रिपुरा में पशु बलि की परंपरा कम-से-कम 500 वर्षों पुरानी है। पशु बलि मुख्य रूप से त्रिपुरा के दो मंदिरों – उदयपुर स्थित त्रिपुरेश्वरी मंदिर और अगरतला के चतुर्दश देवता मंदिर में होती है। दोनों मंदिरों की स्थापना त्रिपुरा पर शासन करने वाले माणिक्य वंश के शासकों द्वारा की गई थी।

पशु बलि की यह परंपरा त्रिपुरा में कम्युनिस्ट शासन के तहत भी जारी रही। हालाँकि अब तक केवल CPM ने इस आदेश का सार्वजनिक रूप से स्वागत किया है।

त्रिपुरा संभवतः भारत का एकमात्र ऐसा राज्य है जहाँ राज्य सरकार 500 वर्ष से अधिक पुरानी दुर्गा पूजा को प्रायोजित करती रही है और जिसका पूर्ववर्ती शाही परिवार द्वारा प्रबंधन किया जाता है। लेकिन अब पूजा की तांत्रिक विधि पर प्रतिबंध से राज्य में बहस छिड़ गई है।

उच्च न्यायालय का पक्ष:

न्यायालय ने निर्णय दिया कि जानवरों की बलि देने की परंपरा को संविधान के अनुच्छेद-25(1) के तहत संरक्षित नहीं किया जा सकता है। धार्मिक स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है। इसके अलावा पशु बलि अनुच्छेद-21 (जीवन का अधिकार) का उल्लंघन है। अदालत ने कहा कि धार्मिक परंपराएँ, पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 के प्रावधानों की अवहेलना नहीं कर सकती।