चंद्रयान-2 के लैंडर ‘विक्रम’ से इसरो का संपर्क टूटा

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चंद्रयान-2 के लैंडर ‘विक्रम’ का संपर्क इसरो के ग्राउंड स्टेशन से लैंडिंग से ठीक पहले टूट गया। जब यह संपर्क टूटा उस समय ‘विक्रम’ चन्द्रमा की सतह से मात्र 2.1 किलोमीटर ऊपर था। अभी डाटा का विश्लेषण किया जा रहा है। लैंडिग चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर होनी थी, यहां इससे पहले किसी भी देश का यान नहीं पहुंच सका था

चंद्रयान-2 भारत का चंद्रमा पर दूसरा मिशन है, यह भारत का अब तक का सबसे मुश्किल मिशन है। यह 2008 में लांच किये गए मिशन चंद्रयान का उन्नत संस्करण है।

जिस ऑर्बिटर से लैंडर अलग हुआ था, वह अभी भी चंद्रमा की सतह से 119 किमी से 127 किमी की ऊंचाई पर घूम रहा है। 2,379 किलो वजनी ऑर्बिटर के साथ 8 पेलोड हैं और यह एक साल काम करेगा। यानी लैंडर और रोवर की स्थिति पता नहीं चलने पर भी मिशन जारी रहेगा। 8 पेलोड के अलग-अलग काम होंगे…

  1. चांद की सतह का नक्शा तैयार करना।
  2. इससे चांद के अस्तित्व और उसके विकास का पता लगाने की कोशिश होगी।
  3. मैग्नीशियम, एल्युमीनियम, सिलिकॉन, कैल्शियम, टाइटेनियम, आयरन और सोडियम की मौजूदगी का पता लगाना।
  4. सूरज की किरणों में मौजूद सोलर रेडिएशन की तीव्रता को मापना।
  5. चांद की सतह की हाई रेजोल्यूशन तस्वीरें खींचना।
  6. सतह पर चट्टान या गड्ढे को पहचानना ताकि लैंडर की सॉफ्ट लैंडिंग हो।
  7. चांद के दक्षिणी ध्रुव पर पानी की मौजूदगी और खनिजों का पता लगाना। ध्रुवीय क्षेत्र के गड्ढों में बर्फ के रूप में जमा पानी का पता लगाना।
  8. चंद्रमा के बाहरी वातावरण को स्कैन करना।

चंद्रयान-2 को GSLV Mk III से लांच किया गया था। इसरो के स्पेसक्राफ्ट (ऑर्बिटर) का वज़न 3,290 किलोग्राम है।