कर्नाटक सरकार की कृत्रिम वर्षा परियोजना

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हाल ही में आई एक रिपोर्ट के अनुसार इस साल वर्षा में कमी आ सकती है जिसके ध्यान में रखते हुए कर्नाटक सरकार ने जून के अंत में कृत्रिम वर्षा करवाने का निर्णय लिया है। इस परियोजना की लागत लगभग 88 करोड़ रुपए आएगी। उल्लेखनीय है कि 22 अगस्त, 2017 को कर्नाटक सरकार ने बंगलूरू में कृत्रिम वर्षा के लिये वर्षाधारी परियोजना को आरंभ किया था।

इससे पहले अगस्त में कृत्रिम वर्षा करवाई जाती थी और तब तक मानसून समाप्त हो जाता था, इस बार इस कमी को दूर करने के लिये मानसून के दौरान ही कृत्रिम वर्षा कराने का फैसला किया गया है। इसके लिये बंगलूरू और हुबली दो केंद्र बनाए गए हैं जहाँ दो विमानों की सहायता से कृत्रिम वर्षा कराई जाएगी। अगर किसी एक क्षेत्र में अधिक वर्षा होती है तो यह केंद्र वहाँ विस्थापित कर दिया जाएगा जहाँ वर्षा कम होने की आशंका हो।

कृत्रिम वर्षा (Cloud Seeding):

क्लाउड सीडिंग मौसम में बदलाव लाने की एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें बादलों से इच्छानुसार वर्षा कराई जा सकती है।

क्लाउड सीडिंग के लिये सिल्वर आयोडाइड या ठोस कार्बन डाइऑक्साइड को विमानों का उपयोग कर बादलों के बहाव के साथ फैला दिया जाता है। विमान में सिल्वर आयोडाइड के दो बर्नर या जनरेटर लगे होते हैं, जिनमें सिल्वर आयोडाइड का घोल उच्च दाब के साथ भरा होता है। जहाँ बारिश करानी होती है वहाँ पर हवा की विपरीत दिशा में इसका छिड़काव किया जाता है। कहाँ और किस बादल पर इसे छिड़कने से बारिश ज़्यादा होगी, इसका फैसला मौसम वैज्ञानिक करते हैं। इसके लिये मौसम के आँकड़ों का सहारा लिया जाता है।

कृत्रिम वर्षा की इस प्रक्रिया में बादल के छोटे-छोटे कण हवा से नमी सोखते हैं और संघनन से उसका द्रव्यमान बढ़ जाता है। इससे जल की भारी बूँदें बनकर बरसने लगती हैं। इसका उपयेाग वर्षा में वृद्धि करने, ओलावृष्टि के नुकसान को कम करने, कोहरा हटाने तथा तात्कालिक रूप से वायु प्रदूषण कम करने के लिये भी किया जाता है।