अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस: 8 सितंबर 2017

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51वां अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस 8 सितंबर, 2017 को विज्ञान भवन, नई दिल्लीत में मनाया गया। इसके लिए यूनेस्कोव द्वारा घोषित विषय ‘डिजिटल दुनिया में साक्षरता’ है।

यूनेस्को ने 7 नवंबर 1965 में ये फैसला किया कि अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस हर वर्ष 8 सितंबर को मनाया जायेगा जोकि पहली बार 1966 से मनाना शुरु हुआ। व्यक्ति, समाज और समुदाय के लिये साक्षरता के बड़े महत्व को ध्यान दिलाने के लिये पूरे विश्व भर में इसे मनाना शुरु किया गया। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के लिये वयस्क शिक्षा और साक्षरता की दर को दुबारा ध्यान दिलाने के लिये इस दिन को खासतौर पर मनाया जाता है।

साक्षरता का अर्थ:

साक्षरता सिर्फ किताबी शिक्षा प्राप्त करने तक ही सीमित नहीं होती बल्कि साक्षरता का तात्पर्य लोगों में उनके अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूकता लाकर सामाजिक विकास का आधार बनाना है। साक्षरता गरीबी उन्मूलन, लिंग अनुपात सुधारने, भ्रष्टाचार और आतंकवाद से निपटने में सहायक और समर्थ है।

अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस का विषय (थीम):

बहुत सारे देशों में पूरे विश्व की निरक्षरता से संबंधित समस्याओं को सुलझाने के लिये कुछ सामरिक योजनाओं के कार्यान्वयन के द्वारा इसे प्रभावशाली बनाने के लिये हर वर्ष एक खास विषय पर अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस उत्सव मनाया जाता है। अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस का कुछ सालाना विषय यहाँ दिया गया है:

  • सामाजिक प्रगति प्राप्ति पर ध्यान देने के लिये 2006 का विषय “साक्षरता सतत विकास” था।
  • महामारी (एचआईवी, टीबी और मलेरिया आदि जैसी फैलने वाली बीमारी) और साक्षरता पर ध्यान देने के लिये 2007 और 2008 का विषय “साक्षरता और स्वास्थ्य” था।
  • लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण पर ध्यान देने के लिये “साक्षरता और सशक्तिकरण” 2009-10 का मुद्दा था।
  • 2011-12 का लक्ष्य “साक्षरता और शांति” था जो शांति के लिये साक्षरता के महत्व पर ध्यान देना है।
  • 2013 का विषय “21वीं सदी के लिये साक्षरता” थी वैश्विक साक्षरता को बढ़ावा देने के लिये था।
  • “साक्षरता और सतत विकास” 2014 का लक्ष्य था, जो पर्यावरणीय एकीकरण, आर्थिक वृद्धि और सामाजिक विकास के क्षेत्र में सतत विकास को प्रोत्साहन देने के लिये है।
  • 2015 का विषय-वस्तु था “साक्षरता एवं सतत सोसायटी”

भारत में साक्षरता:

भारत एक प्रगतिशील देश है। यहां आजादी के समय से ही देश के नेताओं ने साक्षरता बढ़ाने के लिए कई कार्य किए और कानून बनाए पर जितना सुधार कागजों में दिखा उतना असल में नहीं हो पाया। केरल को छोड़ दिया जाए तो देश के अन्य शहरों की हालत औसत है जिसमें से बिहार और उत्तर प्रदेश में तो साक्षरता दर 70 फीसदी से भी कम ही है। स्वतंत्रता के समय वर्ष 1947 में देश की केवल 12 प्रतिशत आबादी ही साक्षर थी। बाद में वर्ष 2007 तक यह प्रतिशत बढ़कर 68 हो गया और 2011 में यह बढ़कर 74% हो गया लेकिन फिर भी यह विश्व के 84% से बहुत कम है। 2001 की जनगणना के अनुसार 65 प्रतिशत साक्षरता दर के साथ ही देश में 29 करोड़ 60 लाख निरक्षर हैं, जो आजादी के समय की 27 करोड़ की जनसंख्या के आसपास हैं।